(रिटायर्ड मेजर जनरल जीडी बख्शी भव्य सम्मान समारोह में स्वतंत्रता सेनानी बख्शी सत्य भूषण शास्त्री जी को सम्मानित करते हुए)
बख्शी सत्य भूषण शास्त्री, जिनका नाम सुनते ही स्वतंत्रता संग्राम की कई अनसुनी कहानियां जीवंत हो उठती हैं, हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले से संबंध रखते हैं। यह वही ऊना है, जो कभी पंजाब का हिस्सा हुआ करता था और आज हिमाचल प्रदेश का गौरव है। सत्य भूषण शास्त्री, श्री लक्ष्मण दास आर्य के सुपुत्र हैं, जो स्वयं एक प्रतिष्ठित स्वतंत्रता सेनानी थे। उनके पिता की देशभक्ति और साहस का प्रभाव शास्त्री जी पर इतनी कम उम्र से पड़ा कि मात्र 7 वर्ष की आयु में उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में क़दम रख दिया।
लक्ष्मण दास आर्य का जिक्र करना यहाँ इसलिए भी जरूरी है क्योंकि उन्होंने अपने बेटे में देशप्रेम की जो अलख जगाई, वह प्रेरणा की अद्भुत मिसाल है। शास्त्री जी ने अपने पिता के साथ अंग्रेज़-विरोधी रैलियों और जुलूसों में हिस्सा लिया, जहाँ उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाज़ उठाई। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब ब्रिटिश हुकूमत भारतीय छात्रों से वार फंड की माँग कर रही थी, तब सत्य भूषण शास्त्री ने इसका डटकर विरोध किया, और इस विरोध के चलते उन्हें स्कूल से निष्कासित भी कर दिया गया।
लेकिन उनकी हिम्मत इतनी आसानी से डगमगाने वाली नहीं थी। उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ जागरूकता फैलाने और साहित्य वितरित करने का कार्य जारी रखा। उनका देशप्रेम और साहस तब और उभरकर सामने आया जब उन्होंने महान क्रांतिकारी सरदार भगत सिंह के साथी गोकुल चंद के साथ मिलकर काम किया। 1945 से 1946 तक वे भूमिगत रहे और भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया।
सत्य भूषण शास्त्री का जीवन एक प्रेरणा है, उनकी कहानी हमें बताती है कि कैसे अपने आदर्शों के प्रति अडिग रहकर देशसेवा की जा सकती है। उनका संघर्ष, साहस और समर्पण हमारे लिए एक मार्गदर्शक की तरह है, और उनके समक्ष यह बात कहना हमारे लिए सौभाग्य की बात है।
प्रस्तुति: सुशील छिब्बर पूर्व वित्त सचिव जीएमएस नई दिल्ली।



