लेखक: स्वर्गीय चौधरी जी.एल. दत्ता “जोश” प्रकाशित लेख मोहयाल मित्र के अंक नवंबर 1993 (इंग्लिश)
अनुवाद: डा.अजय दत्ता
लेख भेजने वाला: मुनीश मेहता (स्वर कला संगम) परपोत्रा , गुरू ग्राम, दिल्ली।
रायज़ादा देवा सिंह बाली के पुत्र, जो अपने समय के एक प्रतिष्ठित सिविल इंजीनियर थे, एक भव्य परियोजना से जुड़े हुए थे — बाढ़ग्रस्त चक्की नदी को एक सुरक्षित मार्ग में मोड़ने की योजना, जिसके लिए पठानकोट के पास धांग पहाड़ियों में विस्फोट कर रास्ता बनाना पड़ा। ऐसे महान पिता के सुपुत्र रायज़ादा हुकम सिंह जी बाली का जन्म गुरदासपुर ज़िले के घरोटा कस्बे में हुआ था।
उन्होंने जम्मू और कश्मीर के मुख्य वन संरक्षक (Chief Conservator of Forests) का गौरवशाली पद संभाला। यह मोहयाल समाज के लिए अत्यंत गर्व की बात थी कि वे इस प्रतिष्ठित पद को संभालने वाले पहले भारतीय बने, क्योंकि इससे पहले सभी अंग्रेज़ थे। मोहयालों ने उचित रूप से रायज़ादा साहिब को स्यालकोट सम्मेलन की अध्यक्षता के लिए चुना और उन्हें यह सम्मान प्रदान किया।
रायज़ादा हुकम सिंह बाली के कार्यकाल में जम्मू और कश्मीर का वन विभाग समाज के युवाओं के लिए रोजगार का एक बड़ा स्रोत बन गया। रायज़ादा साहिब स्वयं इन युवाओं को प्रशिक्षित करते थे और उन्हें ईमानदारी, न्याय और निष्ठा की शिक्षा देते थे। उनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने विभाग के अंदर भी सच्चाई और निष्पक्षता का उदाहरण प्रस्तुत किया, जहाँ आमतौर पर ऐसे गुणों की कमी मानी जाती थी। कई विदेशी अधिकारियों ने, जिन्होंने उनके अधीन काम किया, उनकी बौद्धिक क्षमता और मानवीय मूल्यों की सराहना की।
घरोटा परिवार के प्रसिद्ध पूर्वज अन्य योद्धा मोहयालों की तरह युद्ध कौशल के लिए जाने जाते थे। रायज़ादा हुकम सिंह के दादा जनरल रामसिंह बाली ने अंतिम सिख युद्ध में ब्रिटिश सेना के विरुद्ध सिख सेना के समर्थन में कश्मीर सेना का नेतृत्व किया था। इसी काल में उनका परिवार कश्मीर से गुरदासपुर ज़िले में आकर बस गया, जो ब्यास नदी के किनारे स्थित है।
हम रायज़ादा जे.एस. बाली (E-353, निर्माण विहार, दिल्ली-92) के प्रति आभारी हैं, जिन्होंने हमें स्व. रायज़ादा हुकम सिंह जी बाली का दुर्लभ चित्र और स्यालकोट में हुए मोहयाल सम्मेलन के अध्यक्ष के रूप में उनका जीवन परिचय उपलब्ध कराया। इसने लेख को और रोचक तथा उपयोगी बना दिया है और पाठकों को स्व. अध्यक्ष के परिवार के बारे में जानने का अवसर प्रदान किया है।
– संपादक
चौ. देवा सिंह, सिविल इंजीनियर, की उल्लेखनीय सेवाओं के सम्मान में उनके सुपुत्र श्री हुकम सिंह जी बाली को पाकिस्तान में स्थित मॉन्टगोमरी ज़िले में पाँच स्क्वायर भूमि का पुरस्कार दिया गया था, जहाँ उन्होंने सेवानिवृत्ति के बाद लगभग चार दशकों तक उस क्षेत्र के एक प्रसिद्ध और प्रभावशाली ज़ैलदार के रूप में कार्य किया।
रायज़ादा हुकम सिंह बाली और उनके एकमात्र पुत्र रायज़ादा इंदर सिंह बाली ने इस विशाल ज़मींदारी का उत्तराधिकार प्राप्त किया। रायज़ादा हुकम सिंह बाली ने उन्नीसवीं सदी के अंतिम भाग में देहरादून के वन प्रशिक्षण संस्थान से प्रशिक्षण प्राप्त किया था। संयोगवश, उनके भतीजे रायज़ादा जे.एस. बाली का कार्यालय भी वन विभाग की उसी इमारत में था, जहाँ वे मृदा एवं जल संरक्षण अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र के निदेशक के रूप में कार्यरत थे।
चौ. काशी नाथ दत्त स्यालकोट सम्मेलन के अध्यक्ष और रायज़ादा लछमन दास वैद स्वागत समिति के सचिव थे। यह सम्मेलन 19-20 अप्रैल, 1929 को आयोजित हुआ था।
सम्मेलन में पारित प्रस्तावों में यह निर्णय लिया गया कि मोहयाल मित्र के संपादक को वेतनभोगी बनाया जाए, मोहयाल डायरेक्ट्री प्रकाशित की जाए, मोहयालों का इतिहास संशोधित किया जाए, और मोहयाल प्रतिनिधिमंडल को तत्कालीन सेना प्रमुख (Commander-in-Chief) से मिलवाया जाए ताकि मोहयालों की एक अलग भूमि सेना इकाई बनाई जा सके। साथ ही मोहयाल महिलाओं द्वारा किए गए हस्तशिल्प कार्यों की प्रदर्शनी लगाने का भी निर्णय लिया गया।
यह भी तय हुआ कि मोहयाल समाज के उत्थान के लिए एक उपदेशक (प्रचारक) को आगामी ग्रीष्मकाल में पुंछ और कश्मीर भेजा जाएगा।
सम्मेलन की खेल समिति की अध्यक्षता बक्शी संसार चंद छिब्बर, बी.ए., बी.टी., डी.ई.एस., सियालकोट (पूर्व लेफ्टिनेंट गवर्नर बक्शी एस. के. छिब्बर एवं श्री देव कृष्ण छिब्बर जो कि जालंधर मोहयाल सभा प्रधान भी रहे के पिता) द्वारा की गई।
विभाजन के पश्चात बख्शी संसार चंद छिब्बर जालंधर शहर में बस गए और मोहयाल सभा जालंधर के वरिष्ठ सदस्य रहे। आज भी इनका मकान फगवाड़ा गेट में स्थित है।
यह भी निर्णय लिया गया कि एक मोहयाल पारस्परिक परिवार राहत कोष बनाया जाए, जिसके निदेशक पदेन रूप से जी.एम.एस. (ग्लोबल मोहयाल सभा) के अध्यक्ष और सचिव होंगे। सम्मेलन में कई महिलाओं ने इसकी सदस्यता ग्रहण की और पहली महिला सदस्य सम्मेलन अध्यक्ष की पत्नी थीं।
इस सदी के प्रथम चतुर्थांश में अन्य प्रमुख मोहयालों के साथ मिलकर रायज़ादा हुकम सिंह बाली ने मोहयाल विवाहों में होने वाले अनुष्ठानों और खर्चों को सरल बनाने हेतु नियमों का एक संहिता तैयार करने और लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, ताकि बिरादरी के सभी सदस्य — चाहे उनकी आर्थिक स्थिति बड़ी हो या छोटी — गरिमा और सम्मान के साथ अपना सिर ऊँचा रख सकें।


