शहीदों के सरताज : भाई मतिदास छिब्बर

मोहयाल शख्सियत
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शहीदों के सरताज: भाई मतिदास जी के 350वें शहीदी दिवस पर प्रकाशित लेख मोहयाल रत्न पुस्तक से – लेखक पुष्प बाली

भारत माता की रक्षा के लिए मर-मिटने वालों की हमारे देश में एक सुवर्णिम परंपरा रही है। कई ऐसे देश हैं जो देश, धर्म व मज़हब के लिए ही पैदा हुए तथा अपना सब कुछ त्यागकर दे दिया। मोहयाल पुरखों का इतिहास, अविस्मरणीय त्याग, बलिदान तथा मानव सेवा से भरा पड़ा है। ऐसे ही बलिदानी, मोहयाल विरासत के छिब्बर वंश ने बाबा परागा जी, भाई मतिदास जी, भाई सतिदास जी, भाई बाल लाल तथा भाई परमानंद जी को जन्म दिया, जिन्होंने अतुलनीय त्याग, बलिदान तथा राष्ट्र सेवा के लिए रहती दुनिया तक याद किया जाएगा।

बाबा परागा जी का पराक्रम व इतिहास मोहयालों के छिब्बर वंश में भीष्म पितामह की तरह है, जो 131 साल तक सन 1507 से 1638 तक जीवित रहे। श्री गुरु अंगद देव जी, श्री गुरु अमरदास जी, श्री गुरु रामदास जी, श्री गुरु अर्जुन देव जी तथा श्री गुरु हरगोबिंद जी के राजतिलक समारोह के साक्षी बाबा परागा जी वीर, पराक्रमी, साहसी तथा विद्वान थे। वे छठे गुरु हरगोबिंद देव जी के सेना नायक रहे।
उन्होंने 125 वर्ष की आयु में शस्त्र धारण करके 500 वीर सैनिकों की सेना बनाकर मुग़लों विरुद्ध युद्ध किया एवं युद्ध जीता। बाद में एक भयंकर जंग के बाद बाबा परागा जी ने 131 वर्ष की आयु में वीरगति को प्राप्त हुए। सूर्यप्रकाश पुस्तक में बाबा जी द्वारा इस तरह लिखा है:

बूढ़ा परागा चल कर आया। कृपा दृष्टि से गुरु बरसाया।।
किया पांच सौ सवार संग। कहयो पांच सौ सवार संग। क्यों करो तुम आगे जंग।।

इसी बलिदानी वंश के बाबा परागा जी के पड़पोते थे भाई मतीदास जी छिब्बर जिनको नवें गुरु श्री तेगबहादुर जी ने अपना दीवान नियुक्त किया था तथा इनके भाई सतिदास जी को मंत्री बनाया था। सन 1665 में श्री गुरु तेगबहादुर जी ने सतलुज नदी के किनारे श्री आनंदपुर साहिब नगर बसाया। इस नगर की प्रबंध व्यवस्था भाई मतीदास जी ने किया था। गुरु जी को भाई मतीदास जी से अत्यंत प्रेम तथा उन पर विश्वास था। मुगल

सम्राट औरंगज़ेब के शासन काल में हिंदुओं पर घोर अत्याचार, असहनीय और अमानवीय व्यवहार हो रहा था। जो इस्लाम कबूल नहीं करता था, उसे यातनाएँ दी जाती थीं, मृत्यु दंड दिया जाता था। इस बात से श्री गुरु तेगबहादुर जी बहुत दुःखी हो गए। उस समय गुरुजी पटना में थे। कुछ कश्मीरी पंडितों का एक जत्था भाई मतिदास जी के पास औरंगज़ेब के अत्याचारों से त्रस्त आकर सहायता माँगने पहुँचा।

सारा विवरण सुनकर भाई जी वापस कीरतपुर साहिब पहुँचे व श्री गुरु तेगबहादुर जी ने पहुँचते ही कश्मीरी पंडितों से कहा कि वे औरंगज़ेब से कहें कि पहले गुरु जी का इस्लाम स्वीकार कराओ फिर सभी इस्लाम स्वीकार करेंगे।

जब यह बात औरंगज़ेब के कानों तक पहुँची तो वह आग-बबूला हो गया। श्री गुरु तेगबहादुर जी व भाई मतिदास तथा भाई सतीदास जी सहित अपने अनेक अनुयायियों के साथ औरंगज़ेब से बदला लेने के लिए दिल्ली कूच कर गए। दिल्ली में भाई मतिदास, भाई दयाल जी व गुरु तेगबहादुर जी को बंदी बना लिया गया।

औरंगज़ेब के काज़ी ने दो शर्तें रखीं—या तो इस्लाम स्वीकार कर लें अथवा मृत्यु को अंगीकार कर लें। भाई मतिदास जी ने काज़ी के कहे अनुसार इस्लाम न कबूल कर मृत्यु को अंगीकार करना स्वीकार किया।

औरंगज़ेब ने भय उत्पन्न करने के लिए भाई मतिदास जी को आरे से चीरने का हुक्म दिया। 9 नवंबर 1675 को चांदनी चौक दिल्ली में भाई मतिदास जी को लकड़ी के दो भागों के बीच बाँध कर क्रूरता से आरा से चीर दिया गया।

दृश्य यह था—बदन पर आरा चल रहा था, खून फव्वारों की तरह फूट रहा था, किंतु हौसलों की बुलंदी का यह आलम था कि जब तक भाई मतिदास जी की आत्मा ने देह नहीं त्यागी, उनके मुख से ये बोल ‘आरा चलदा ऐ, आरा प्यारा लगदा ऐ’ निकल रहे थे। सूर्य प्रकाश पुस्तक में छपी कविता है :

मतिदास को कौंन बुलावन, दो तख्तों में दीन बंधावन,
हुक्म जलादां हथी उंचारा, लै आरा सर तिस पर धारा, आधों अधर्य चरायो हो डार, पइयो पृथ्वी पर दो फाड़।

इतना ही नहीं, अगले दिन भाई मतिदास जी के भाई भाई सतीदास जी को गरम-गरम तेल डालकर जला दिया गया। भाई दयाला जी को रूई के साथ लपेट कर जलाया गया। श्री गुरु तेगबहादुर जी का सर तलवार से काट दिया गया। इनके बलिदान पर दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने मतिदास को भाई का खिताब दिया तथा मति दास के वंशजों को भाई कहकर संबोधित किया तथा उच्च पदों पर रखा गया। यही बलिदानी परंपरा बाद में भी कायम रही। कहते हैं ‘क्या हुआ गर मर गए वतन के वास्ते,बुल-बुलें कुरबान होती है चमन के वास्ते।’मुफ्त में आजादी मिलती नहीं दोस्तों,मुल्क जो आजाद होते हैं लहू के मोल होते हैं।

साभार:मोहयाल रत्न पुस्तक।
लेखक पुष्प बाली

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