मोहयाल बिरादरी की पहचान केवल पराक्रम और वीर सेवा जैसी उपलब्धियाँ उपलब्ध कराना ही नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक धरोहरों की संभाल व रखरखाव मान्य रखता है। इन्हीं धरोहरों में हमारे मोहयाल आश्रम विशेष स्थान रखते हैं।
हमारे पूर्वजों ने कठिन परिश्रम, समर्पण और सामाजिक सहयोग द्वारा आज़ादी के आंदोलन के साथ-साथ समाज के उत्थान पर इन आश्रमों की नींव रखी। उद्देश्य केवल यात्रियों और श्रद्धालुओं को ठहरने की सुविधा उपलब्ध कराना नहीं था, बल्कि समाज में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को एक ऐसा साझा केंद्र प्रदान करना था जहाँ हमारी परंपराओं में बसी बातचीत, द्वंद्व और जीवन्त रहे और आने वाली पीढ़ियाँ अपने इतिहास पर गर्व से बात कर सकें।
मोहयाल बिरादरी को प्रेरणा देने में दान और सहयोग की भावना का विशेष स्थान रहा है। आश्रमों के व्यवस्थापन को सुचारू रखना मेहनत और लगन का प्रतीक है। आज हमारे पास हरिद्वार और वृंदावन जैसे पवित्र नगरों पर स्थित मोहयाल आश्रम हैं, जो हमारी एकता, प्रतिष्ठा और संस्कारों को जीवित रखते हैं।
इन आश्रमों के परिसर में यह अहसास होता है कि हम अपने पूर्वजों के उस मेहनत और त्याग से जुड़े हुए हैं, जिन्होंने अपने समय में समाज को संगठित और सशक्त किया।
अब यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम इस विरासत को संजोएं और अधिक सुसज्जित करें। मोहयाल आश्रम हमारी धरोहर हैं। हमारे संस्कार, हमारे मूल्य और हमारी नई पीढ़ी को इससे जोड़ना समय की मांग है।
यह आश्रम किसी जीएमएस संस्था की संपत्ति नहीं, बल्कि हमारी अपनी विरासत हैं—जिन्हें हमारी मेहनत, श्रम और समर्पण से संवारना होगा।
मोहयाल समुदाय के गौरव को बनाए रखने के लिए हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे आश्रम स्वच्छ, व्यवस्थित और अनुशासित बने रहें। हमारी सांस्कृतिक धरोहरें हमें गर्व और प्रेरणा देती हैं—और यही मोहयाल समाज की असली पहचान है।
(संदीप बाली, “गुरू भाई”, मोहयाल सभा महरौली)


