“4 नवंबर 150 वी जयंती क्रांतिकारियों के महागुरु भाई परमानंद: बलिदानी पूर्वजों के वंशज थे क्रांतिकारी भाई परमानंद छिब्बर” — गोपाल कृष्ण छिब्बर
भारत के स्वाधीनता आंदोलन में अनेक क्रांतिकारी महापुरुषों ने भी महान बलिदान दिया है परन्तु उनके योगदान को अनदेखा किया गया जो दुर्भाग्यपूर्ण है उनमें एक नाम महान व्यक्तिव भाई परमानंद का है जिनकी आज 150 वी जयंती है ।
भाई परमानंद के पूर्वज भाई मतिदास छिब्बर को 9 नवम्बर 1675 की दिल्ली के चांदनी को में मुगल सम्राट औरंगजेब ने इस्लाम धर्म स्वीकार न करने पर आरे से चिरवा दिया था उनके दो अन्य भाई जतीदास दास को गरम तेल के कड़ाव में डालकर ओर तीसरे भाई सतीदास को रूई में लपेटकर जलाकर मार दिया था
भाई मतिदास सिख गुरु तेग बहादुर के प्रधान मंत्री थे और इनके पूर्वजों सिख गुरुओं के प्रधान रहे इसीलिए भाई का खिताब सिख गुरू ने सेवा एवम बलिदान के कारण दिया था भाई मति दास का स्मारक दिल्ली के चांदनी चौक गुरुद्वारा शीशगंज के साथ आज भी स्थित है ।
भाई परमानंदजी के चचेरे भाई क्रांतिकारी भाई बालमुकुंद को 8 मई 1914 को ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड हार्डिग पर बम फेंकने पर दिल्ली में फांसी की सजा दी गई थी।
भाई परमानंद को क्रांतिकारियों का महागुरु कहा जाती हैं करतार सिंग सराबा भगत सिंह राम प्रसाद बिस्मिल आदि अनेक उन्हें अपना गुरु मानते थे भाई परमानंद जी को 27 क्रांतिकारियों के साथ 30 सितम्बर 1915 लाहौर षड्यंत्र प्रकरण में फांसी की सजा हुई थी। बाद में भाई परमानंद जी एवं 20 क्रांतिकारियों की सजा को अंडमान जेल में आजन्म कारावास में बदल दिया था।
अपने अंडमान के कारावास के समय उनकी 2 पुत्रियों का निधन हो गया था ओर पत्नी भाग्यशुदी ने बच्चों के साथ कष्टमय जीवन बिताया भाई परमानंद ओर वीर सावरकर अंडमान में साथ थे उनकी नरकीय यातनाओं की अलग कहानी है जो उन्होंने जेल में लिखी पुस्तक आप बीती में उल्लेख किया है ।
भाई परमानंद जी ने 1903 में ही एम ए कर लिया था उन्होंने आर्य मिशनरी के रूप में हिंदुत्व के प्रचार के लिए अमेरिका वेस्टइंडीज ओर ब्रिटेन का दौरा किया था लन्दन में वीर सावरकर ओर लाला हरदयाल से मुलाकाते होती रहती ओर देश की स्वतंत्रता की योजना बनाते रहे ।
भाई परमानंद साउथ अफ्रीका भी गए जहां महात्मागांधी के मेहमान भी रहे भाई परमानंद जी ने अनेकों पुस्तकें लिखी जिसमें भारत का इतिहास पुस्तक को ब्रिटिश सरकार ने जब्त कर प्रतिबंध लगा दिया था।
20 अप्रैल 1920 में भाई परमानंद जी को रिहा कर दिया उनके समर्थकों ने उनके संघर्ष ओर परिवार की विषम आर्थिक स्थिति के लिए 20 हजार की राशी ( जो आज करोड़ रुपए से अधिक है )एकत्र कर उन्हें भेंट करने गए परंतु उन्होंने यह राशी लेने से इंकार कर दिया ओर कहा देश ओर धर्म की सेवा त्याग की कोई कीमत नहीं होती ।
भाई परमानंद जी के राष्ट्रभक्ति के उच्च आदर्श अनुकरणीय है ।
भाई परमानंद रिहाई के बाद लाहौर आकर फिर अध्यापन करने का निश्चय किया उन्हें राष्ट्रीय विद्यापीठ का उपकुलपति बनाया गया क्रांतिकारी भगत सिंह इसी विद्यापीठ में अध्ययन कर रहे थे भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह ओर चाचा अजीत जी भाई परमानंद जी के घनिष्ठ मित्र थे।
भाई परमानंद 1935 में केंद्रीय विधान सभा के सदस्य कांग्रेस के उम्मीदवार को पराजित कर चुने गए थे जो एक बहुत बड़ी सफलता थी भाई प्रखर वक्ता थे केंद्रीज विधान सभा में कम्युनल अवॉर्ड पर उनका भाषण उल्लेखनीय है उन्होंने 1930 में ही भारत विभाजन की आशंका व्यक्त कर दी थी ।
15 अगस्त 1947 को भारत विभाजन से उनका मन व्यथित हो गया बीमार हो गए ओर 8 दिसंबर 1947 को जालंधर में इस महान क्रांतिकारी युगदृष्टा व्यक्तिव ने पर प्राण त्याग दिए।
प्रस्तुति: सीनियर एडवोकेट गोपाल कृष्ण छिब्बर भोपाल।


