लेखक : पुष्प बाली
भीषण सर्दी, बरसात व गर्मी भी जिन्हें न महसूस हुई, त्योहारों के दिन भी जिनको याद न आए, जो अपने परिवार के दुःखों को भी समझ न पाए, समझे तो सिर्फ इतना कि मेरे देश को कोई दुश्मन चोट न पहुंचाए। मेरे देश का हर व्यक्ति अमन, चैन व सुख से रह सके। उनकी आज़ादी कोई छीन न ले जाए। ऐसा जज्बा, प्रेरणा व देश सेवा के लिए भारतीय सेना में कदम रखा था इन वीरों ने। हम अपने घर में बड़े आराम से सोते हैं। हमारे वीर सारी रात जाग कर सीमा पर पहरा देते हैं।
एक लड़ाई थी। सामने एक दुश्मन था। दुश्मन का पता था। एक लड़ाई है घर की, मालूम नहीं कि दुश्मन कौन है, गोली किस तरफ से आएगी, कौन गोली चलाएगा, क्या चाहते हैं वह? यह लड़ाई सबसे घातक साबित होती है क्योंकि हर दुश्मन को नहीं जानते। इन सबका सामना करते हुए पता नहीं कितने ही सेनानायकों ने अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। इनमें से ही हैं भारतीय सेना के शहीद बहादुर युवा मोहयाल से. ले. पुनीत दत्त, मेजर नितिन बाली, मेजर रोहित दत्ता, मेजर सुनील बख्शी व हवलदार नवीन कुमार वैद।
से. ले. पुनीत दत्त ने बारहवीं कक्षा पास करके सन 1991 में एनडीए में प्रवेश किया था। सेना में भर्ती के समय इनका फैसला था—जीते जी कुछ करना सीखें, मौत के पहले मरना सीखें। वह 20 जुलाई 1997 के दिन श्रीनगर में छिपे कश्मीर के आतंकवादियों का सफाया करने की दृढ़ प्रतिज्ञा करके एक स्थान पर छिपे आतंकवादियों को मार गिराने के पश्चात उनकी गोली का निशाना बन गए। केवल 24 वर्ष की आयु में मातृभूमि की सेवा करते हुए शहीद हो गए। भारत सरकार ने आपको मरणोपरांत राष्ट्र के सर्वोच्च सैनिक सम्मान ‘अशोक चक्र’ से सम्मानित किया, जिसको उनकी माता श्रीमती अनीता दत्त ने स्वीकार किया। जनरल मोहयाल सभा ने भी आपको मरणोपरांत ‘मोहयाल गौरव’ से सम्मानित किया।
शहीद मेजर नितिन बाली का जन्म 16 मार्च 1971 को कुरुक्षेत्र हरियाणा में हुआ। इनके पिता डा. शांति स्वरूप बाली कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के प्राध्यापक रह चुके हैं। मेजर बाली ने सन 1992 में एनडीए पास की व सन 1993 में आईएमए पास करके देश की रक्षा हेतु तीसरी गोरखा इंफैंट्री रेजीमेंट में प्रवेश किया था। आप 25 अक्टूबर 1998 को कश्मीर के कारगिल क्षेत्र में तैनात थे। 18000 फीट की बर्फीली चोटियों पर भारत मां की रक्षा करते हुए केवल 27 वर्ष की आयु में ही अपने प्राण न्योछावर किए। इनके सम्मान में कुरुक्षेत्र के एक मार्ग का नाम मेजर नितिन बाली मार्ग रखा गया। जनरल मोहयाल सभा ने आपको मरणोपरांत “मोहयाल गौरव” से सम्मानित किया।
डा. रत्न कुमार दत्ता के सुपुत्र मेजर रोहित दत्ता जो 1997 में बनिहाल जिला डोडा (कश्मीर) में तैनात थे। इनकी शादी हुए अभी तीन वर्ष ही हूं थे । आपके रेडियो आपरेटर पर एक मई 1997 में आतंकवादियों ने हमला कर दिया। आप उसे बचाने के लिए आगे बढ़ते तो आतंकवादियों ने आप पर हमला कर दिया। केवल 31 वर्ष की आयु में इस युवा ने अपनी मातृभूमि की रक्षा हेतु अपने प्राण दे दिए। जनरल मोहयाल सभा ने भी आपको मरणोपरांत “मोहयाल गौरव” से सम्मानित किया।
श्री कुलजस राय छिब्बर के सुपुत्र मेजर सुनील बख्शी (छिब्बर) जो भारत माता की रक्षा हेतु मणिपुर के उखरूल नगर के मिन्नी बाजार में जब ड्यूटी पर तैनात थे। तो बाजार में घात लगाकर नागा विद्रोहियों ने 9 मई 1994 को आप पर गोलियों की बौछार कर दी। आपने देश की सेवा करते हुए केवल 36 वर्ष की आयु में प्राण त्याग दिए। आपकी स्मृति में बाली नगर नई दिल्ली में मुख्य मार्ग का नामकरण शहीद मेजर सुनील बख्शी (छिब्बर) किया गया। जनरल मोहयाल सभा ने भी आपको मरणोपरांत “मोहयाल गौरव” से सम्मानित किया।
22 मई 1999 के दिन 23 राजपूत रैजीमैंट में कार्यरत हवालदार नवीन कुमार वैद जम्मू के नजदीक नौशेरा बॉर्डर पर तैनात देश की रक्षा कर रहा था। तो सुबह 8.30 के करीब पाकिस्तान की फौज ने नौशेरा पोस्ट पर अचानक हमला कर दिया ।
नवीन कुमार वैद व उसके चार साथी देश की रक्षा हेतु वीरगति को प्राप्त हुए। जनरल मोहयाल सभा ने अपने हवलदार नवीन कुमार वैद को शहादत पर इनको ‘मोहयाल गौरव’ पुरस्कार से नवाजा व उसके परिवार को 51,000 रुपये की राशि देकर आर्थिक मदद भी की। मोहयाल समाज का इतिहास गौरवपूर्ण है। आज भी इस समुदाय के युवा अपनी परंपरा को निभाते आ रहे हैं। वे देश के लिए प्राण न्योछावर करने में सबसे आगे रहते हैं। आज समाज को इन शहीद योद्धाओं पर गर्व है। समाज इन युवा मोहयालों को कभी न भूल सकेगा जिन्होंने देश सेवा के लिए प्राण त्याग दिए। इन्होंने साबित कर दिया कि बेखौफ शेर सूरमे जो देश के हित में मरे गए, अमर अपने नाम को युग-युग तक वह कर गए। वीरों की शहादत पर ठीक ही कहा है :
‘देश पर वीर जो होते हैं कुर्बान, गाता है सारा जग उनके यशगान।’
आज देश को अपनी आज़ादी को बचाने के लिए ऐसे ही वीरों की आवश्यकता है।
साभार : पुस्तक मोहयाल रत्न


