जालंधर, (14 जून 2026) तीर्थ नगरी हरिद्वार स्थित मोहयाल आश्रम में 10 से 13 जून तक प्रवास करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यद्यपि यह मेरा पहला दौरा नहीं था, बल्कि पूर्व में भी अनेक बार सपरिवार यहां आने का अवसर मिला है, किंतु प्रत्येक यात्रा एक नई आध्यात्मिक अनुभूति और आत्मीयता का एहसास कराती है।
मोहयाल आश्रम का वातावरण श्रद्धा, अनुशासन और सेवा-भाव का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। यहां का सुव्यवस्थित प्रबंधन न केवल अनुकरणीय है, बल्कि प्रत्येक यात्री के स्वागत और सुविधा के प्रति पूरी तरह समर्पित दिखाई देता है। आश्रम के कर्मचारी वर्षों से निष्ठा और समर्पण के साथ अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं, जिससे यहां आने वाले श्रद्धालुओं को घर जैसा अपनापन महसूस होता है।
आश्रम की प्रबंधक श्रीमती ईशा जी विशेष रूप से प्रशंसा की पात्र हैं। वे प्रत्येक यात्री की समस्याओं और आवश्यकताओं को गंभीरता से सुनकर उनका त्वरित समाधान सुनिश्चित करती हैं। उनके कुशल सौम्य व्यवहार से आश्रम की व्यवस्थाओं में और अधिक गरिमा जुड़ जाती है।
आश्रम के भोजनालय में कार्यरत कर्मचारी भी सेवा-भाव की अनूठी मिसाल पेश करते हैं। भोजन की गुणवत्ता, स्वच्छता और व्यवस्था संतोषजनक है, जो श्रद्धालुओं के प्रवास को और अधिक सुखद बनाती है।
इस बार हमें आश्रम की तीसरी मंजिल पर स्थित नवनिर्मित कक्ष में ठहरने का अवसर मिला। स्वच्छ, सुसज्जित और आधुनिक सुविधाओं से युक्त यह कमरा आश्रम की उन्नत व्यवस्थाओं का परिचायक है।
तीन दिनों का यह प्रवास मन को शांति, आत्मा को संतोष और हृदय को आत्मीय स्मृतियों से भर गया। वास्तव में मोहयाल आश्रम हरिद्वार केवल एक भवन नहीं, बल्कि वह पावन धाम है जहां आस्था और सेवा एक साथ निवास करती हैं।
प्रस्थान से पूर्व भगवान परशुराम जी की दिव्य प्रतिमा को नमन करते हुए आश्रम की प्रबंधक श्रीमती ईशा जी के साथ स्मृति-चित्र लिया गया और मन में मधुर यादों को संजोते हुए “जय मोहयाल” के उद्घोष के साथ आश्रम से विदा ली।
प्रस्तुति : वंदना दत्ता शर्मा, जालंधर,



