दानवीर तथा समाज सेवक लाला देसराज मोहन

मोहयाल शख्सियत
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मोहयाल समुदाय में ऐसे दानवीर और समाज सेवक हुए हैं जिन्होंने मोहयाल समुदाय में अपनी अमिट छाप छोड़ी उन्हीं में से एक लाला देसराज मोहन थें। उनके व्यक्तित्व पर यह लेख पुष्प बाली द्वारा प्रकाशित पुस्तक मोहयाल रत्न से लिया गया है।

दानवीर तथा समाज सेवक लाला देसराज मोहन 

देश की युवा पीढ़ी के समक्ष सबसे बड़ा संकट है आदर्श व्यक्तित्वों का अभाव। यह किसी भी समाज के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता है कि उसकी युवा पीढ़ी को प्रेरित करने वाले आदर्श व्यक्तित्व ही न हों। युवाओं के लिए मोहयाल बुजुर्गों, बलिदानियों एवं समर्पित कार्यकर्ताओं के उदाहरण उपलब्ध हैं। जरूरी है कि उन्हें बाबा प्रागा, भाई मतिदास, भाई  सतिदास,भाई बालमुकंद, सती रामरखी, भाई परमानंद, मेजर नितिन बाली, सै. पुनीत दत्त , मेजर रोहित दत्त, मेजर सुनील बख्शी व हवलदार नवीन वैद जैसे वीरों के बलिदान के बारे में जानकारी मिले ताकि बच्चे देश सेवा करके अपनी विलक्षण प्रतिभा का परिचय दे सकें। ऐसे ही हैं योद्धा, स्वतंत्रता संग्रामी, समाज सेवक, देश प्रेमी व युवाओं के प्रेरणा स्रोत मोहयाल केसरी लाला देश राज मोहन थें।

इनका कहना था ‘जो समाज अपने बुजुर्गों व वीरों के बलिदान को भुला देता है हकीकत में वह समाज कभी स्वतन्त्र नहीं रह सकता’। पूर्वजों व बिरादरी की महान आत्माओं के कार्य, त्याग, बलिदान व उपलब्धियों को हमेशा याद रखना चाहिए। इन्होंने गुलामी व आज़ादी को बड़ी नजदीक से देखा व महसूस किया है।

लाला देश राज मोहन जी का जन्म गाँव हरदोवाल जिला गुरदासपुर (पंजाब) में अप्रैल 1911 को मेहता लाला चंद मोहन जी के घर हुआ। इनके पिता जी जनरल मोहयाल सभा के सिल्वर जुबली जो सन् 1927 को लाहौर में मनाई गई थी, के अध्यक्ष पद पर थे। इनके बड़े भाई मेहता रणवीर सिंह मोहन पंजाब के एम.एल.ए. रह चुके हैं। इनका मुख्य कारोबार खेती-बाड़ी व पशु-पालन था। इनको आलू उत्पादन पर स्टेट अवॉर्ड भी मिला। इन्होंने समाज की भलाई के लिए आँखों के अनेक मुफ्त कैंप लगाए व गाँव हरदोवाल में अपने पिता जी के नाम पर मुफ्त दवाखाना भी खोला। इन्होंने 13 लाख 78 हजार रुपए की राशि मोहयाल सेवा सदन हरिद्वार के निर्माण हेतु जनरल मोहयाल सभा को दी।

49वीं आल इंडिया मोहयाल कॉन्फ्रेंस के दौरान इनको ‘मोहयाल गौरव’ से सम्मानित किया गया। इनका कहना है कि संसार में जितनी क्रांतियां हुई हैं, उन सब के पीछे सदा से युवाओं का हाथ रहा है। देश सुख-शांति, समृद्धि और प्रगति में युवा पीढ़ी की साझेदारी है। राष्ट्र के युवक भावी पीढ़ी के न्यासी होते हैं। राष्ट्र का प्रत्येक कार्य युवकों के बिना अधूरा रह जाता है। निर्माण सदैव बलिदान पर टिकता है। अतः मातृभूमि के प्रति सर्वस्व समर्पण की भावना, बलिदान की भावना की खाद हम बाल और युवा सभाओं का आयोजन करके ही दे सकते हैं ताकि युवा पीढ़ी में उक्त गुणों का विकास कर सकें। इनकी सोच है कि हमारा यह देश वह देश है जहाँ माताएँ भगवान को भी गोदी में खिलाती हैं।

हमारे देश की वीरांगनाओं ने ऐसे महान नेताओं, शुरवीरों को जन्म दिया है जिन्होंने देश की खातिर घास तक की रोटियाँ खाकर अपनी क्षुधा का निवारण किया। आज हमें आवश्यकता है देश के शुरवीरों की गाथाओं को युवाओं तक पहुँचाने की, ताकि उनका अनुसरण करके भ्रष्टाचार एवं अपराधिकरण नामक दानवों का दृढ़ता से मुकाबला कर सकें और भविष्य में ऐसा कुछ न होने दें जिससे कि हमारे देश का सफेद दामन कलंकित हो। इनका कहना है कि बुढ़ापा केवल सोचना जानता है, करना नहीं, जबकि जवानी सोचती कम है और करती अधिक है।

युवाओं को ऐसी प्रेरणा दें कि वह अपना व देश का भविष्य  उज्ज्वल बना सकें। आइए मिलकर सोचें-समझें और आगे बढ़ें। आज वह हमारे बीच में नहीं है उनकी सोच और प्रेरणा सदैव मोहयाल समुदाय और देश की भलाई का कार्य कने का मार्गदर्शन करतीं रहेंगी।

लेखक: पुष्प बाली, ” पुस्तक मोहयाल रत्न “

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